यहेजकेल 1-48
यहेजकेल
लेखक
यह पुस्तक बूजी के पुत्र यहेजकेल की कृति मानी जाती है। वह एक याजक एवं भविष्यद्वक्ता था। वह पुरोहितों के परिवार में यरूशलेम में बड़ा हुआ था। वह भी बाबेल की बन्धुआई में यहूदियों के साथ था। यहेजकेल की पुरोहितवृत्ति उसकी भविष्यद्वाणी की सेवा में दिखाई देती है। उसकी भविष्यद्वाणी में मन्दिर, पुरोहित की सेवाएँ, परमेश्वर की महिमा तथा बलि पद्धति के विषय देखने को मिलते हैं।
लेखन तिथि एवं स्थान
लगभग 593-570 ई. पू.
यद्यपि यहेजकेल ने बाबेल में अपना लेखन कार्य किया। उसकी भविष्यद्वाणी इस्राएली, मिस्र तथा अनेक पड़ोसी राज्यों के सम्बंध में भी थी।
प्रापक
बाबेल के बन्धुआ इस्राएली तथा स्वदेश में वास कर रहे इस्राएली और सब उत्तरकालीन बाइबल पाठक।
उद्देश्य
यहेजकेल एक अत्यधिक पापी एवं पूर्णतः निकम्मी पीढ़ी के लिए सेवारत था। उसने अपनी भविष्यद्वाणी की सेवा के द्वारा अपने लोगों को तात्कालिक मन फिराव और भविष्य में आत्म-विश्वास के लिए प्रेरित किया था। उसने शिक्षा दी कि परमेश्वर मानवीय सन्देशवाहकों द्वारा काम करता है। चाहे हम पराजित हों और निराश हों, हमें परमेश्वर की परम प्रभुता में विश्वास करना है। परमेश्वर का वचन अचूक है। परमेश्वर सर्वत्र उपस्थित है और उसकी उपासना कहीं भी की जा सकती है। यहेजकेल की पुस्तक हमें स्मरण कराती है कि हमें उन अन्धकारपूर्ण समयों में भी जब हमें ऐसा प्रतीत हो कि हम भटक गए हैं, परमेश्वर की खोज करना है। हमें अपना आत्म-निरीक्षण करके एकमात्र सच्चे परमेश्वर से सम्बंध साधना है।
मूल विषय
प्रभु की महिमा
रूपरेखा
1. यहेजकेल की बुलाहट — 1:1-3:27
2. यरूशलेम, यहूदिया और मन्दिर के विरुद्ध भविष्यद्वाणी — 4:1-24:27
3. अन्यजातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी — 25:1-32:32
4. इस्राएलियों के लिए भविष्यद्वाणी — 33:1-39:29
5. पुनरुद्धार का दर्शन — 40:1-48:35